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Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 27, Verse 35

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 27, verse 35 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 27 · श्लोक 35

संस्कृत श्लोक

चमत्कृतिश्चेह मनस्विलोकचेतश्चमत्कारकरी नराणाम् । स्वप्नेऽपि साधो विषयं कदाचित्केषांचिदभ्येति न चित्ररूपा ॥ ३५ ॥

हिन्दी अर्थ

इसी प्रकार प्रकृति की दृष्टि में सम्पूर्ण विकार भी असत्य ही प्रतीत होते है। पर्वत वस्तुतः पाषाण ही हैं, पृथिवी मिट्टी ही है, वृक्ष काष्ठ ही हैं और मनुष्य मांस आदि ही हैं अर्थात्‌ पर्वत पत्थर से अतिरिक्त वस्तु नहीं है, पृथिवी मिट्टी से अतिरिक्त नहीं है, वृक्षो में काष्ठ से भिन्न कुछ नहीं है और मनुष्य भी हाड, मांस आदि के ही पुतले हैं, उनसे पृथक्‌ उनमें कुछ नहीं है। यदि ऐसा है, तो उनमें पर्वत आदि विशेषजुद्धि क्यों होती है ? ऐसी शंका यदि हो, तो उस पर सुनिए-व्यवहार के लिए मनुष्यों ने उनका नाम रख दिया है, वास्तव में वे पूर्वसिद्ध पाषण आदि पदार्थो से भिन्न नहीं है । इसी प्रकार सब जगह तुल्य युक्ति से विकाररहित सम्पूर्ण जगत्‌ प्रकृतिभूत एक ही वस्तु है, ऐसा युक्ति से प्रतीत होता है । अथवा यदि यह शंका हो कि पर्वत आदि विकार भले ही असत्य हों, उनके कारण पाषाण, मिट्टी आदि की असत्यता कैसे ? उस पर कहते हैं। वे भी अपने कारण महाभूतों के विकार हैं, अतः असत्य हैं । इस भोग्यवर्ग में विकार से भिन्‍न कुछ भी नहीं हे । विकार होने से ये विषय आदि सब मिथ्या हैं, इसलिए भी इन पर विश्वास ही नहीं करना चाहिए ॥३ ३॥ पाषाण आदि केवल महाभूतमात्र हैं, ऐसा जो पहले कहा था, उसीको स्फुट करते हैं । जल, वहि, वायु, आकाश ओर पृथिवी ये पाँच महाभूत ही परस्पर मिलकर गो, घट आदि विविध पदार्थों के रूप में अविवेकी पुरूषों द्वारा उनकी बृद्धि से प्रतीत होते हैं, यह बड़े खेद की बात हे । विवेकदृष्टि से पृथक्‌-पृथक विभाग से संशोधन करने पर तो पंचभूत से अतिरिक्त कोई भी पदार्थ नहीं है अर्थात्‌ अविवेकी पुरुष ही मोहवश पंचमहाभूतविकार जगत्‌को सत्य समझता है, पर जो विवेकी हैं, उनको तो इस जगत्‌में पंचमहाभूतसमुदाय से अतिरिक्त कोई वास्तविक पदार्थ प्रतीत नहीं होता ॥ ३ ४॥ यदि इस प्रकार सम्पूर्ण पदार्थो को असत्य मानें, तो मनुष्योंके व्यवहार और भोग कैसे होगे ? शुक्तिरजत से क्या कोड भी कड़ा बना सकता है ? इस शंका पर कहते हैं। मुनिवर, इस मिथ्यारूप जगत में व्यवहारकुशल विद्वान लोगों के मन में भी भोगचमत्कार को उत्पन्न करनेवाली जो व्यवहारचमत्कृति प्रतीत होती है, वह कोई आश्चर्यजनक नहीं है, क्योंकि कदाचित्‌ स्वप्न में मिथ्याभूत विषयों को देखकर भी उस प्रकार की चमत्कृति लोगों को होती है