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Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 28, Verses 17–24

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 28, verses 17–24 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 28 · श्लोक 17-24

संस्कृत श्लोक

दिवसास्ते महान्तस्ते संपदस्ताः क्रियाश्च ताः । सर्वं स्मृतिपथं यातं यामो वयमपि क्षणात् ॥ १७ ॥ प्रत्यहं क्षयमायाति प्रत्यहं जायते पुनः । अद्यापि हतरूपाया नान्तोऽस्या दग्धसंसृतेः ॥ १८ ॥ तिर्यक्त्वं पुरुषा यान्ति तिर्यञ्चो नरतामपि । देवाश्चादेवतां यान्ति किमिवेह विभो स्थिरम् ॥ १९ ॥ रचयन्रश्मिजालेन रात्र्यहानि पुनःपुनः । अतिवाह्य रविः कालो विनाशावधिमीक्षते ॥ २० ॥ ब्रह्मा विष्णुश्च रुद्रश्च सर्वा वा भूतजातयः । नाशमेवानुधावन्ति सलिलानीव वाडवम् ॥ २१ ॥ द्यौः क्षमा वायुराकाशं पर्वताः सरितो दिशः । विनाशवाडवस्यैतत्सर्वं संशुष्कमिन्धनम् ॥ २२ ॥ धनानि बान्धवा भृत्या मित्राणि विभवाश्च ये । विनाशभयभीतस्य सर्वं नीरसतां गतम् ॥ २३ ॥ स्वदन्ते तावदेवैते भावा जगति धीमते । यावत्स्मृतिपथं याति न विनाशकुराक्षसः ॥ २४ ॥

हिन्दी अर्थ

महर्षिजी, आप विचार कर देखें वे उत्सव और वैभव से परिपूर्ण दिन, वे महापुरुष, वे प्रचुर सम्पत्तियाँ, वे यज्ञ आदि क्रियाएँ कहाँ हैं ? वे सब-के-सब हमारे दृष्टिपथ से दूर हो गये हैं, अब केवल उनकी स्मृति ही शेष रह गई है, वैसे ही हम भी थोड़े ही दिनों में चले जायेंगे, हमारी भी केवल स्मृति ही शेष रह जायेगी । यह गर्हित संसार प्रतिदिन नष्ट होता है और प्रतिदिन फिर उत्पन्न होता है। कितना काल बीत गया इसकी सीमा नहीं है, फिर भी आज तक इस निन्दत संसार का अन्त नहीं हुआ, यह बराबर चलता ही जाता है। मनुष्य पशु आदि योनि को प्राप्त होते हैं, पशु आदि मनुष्य-जन्म को प्राप्त होते हैं और देवता देवभिन्न योनियों में जन्म लेते हैं; भला बतलाइए तो सही, इस संसार में कौन वस्तु स्थिर है ? सभी का तो विपर्यास (परिवर्तन) दिखलाई दे रहा है। कालरूप सूर्य अपनी किरणों द्वारा रात-दिन पुनःपुनः प्राणियों की सृष्टिकर अनेक रात्रि ओर दिनों को बिताकर स्वयं रचित भूतो के विनाश की अवधि की प्रतीक्षा करता है। और को क्या कहें, ब्रह्मा, विष्णु, रूद्र आदि एवं सम्पूर्ण प्राणिवर्ग जैसे जल बडवाग्नि का (~) अनुसरण करता है वैसे ही विनाश का अनुसरण करते हैं । कहाँ तक कहें, द्युलोक, पृथिवी, वायु, आकाश, पर्वत नदियाँ, दिशाएँ ये सब के सब विनाश रूपी अग्नि के लिए सूखे काष्ठ हैं अर्थात्‌ जैसे अग्नि को सूखे लकड को जलाने में कुछ भी विलम्ब नहीं होता, वैसे ही इनका विनाश होने में भी कुछ काल नहीं लगता। काल से भयभीत पुरुषों के धन-सम्पत्ति, बन्धु बान्धव, मृत्यु मित्र ओर रेश्वर्य ये नीरस हो गये हैं इस जगत्‌ में विवेकशील पुरुषों को तभी तक ये पदार्थ अच्छे लगते हैं, जब तक कि विनाशरूपी दुष्ट राक्षस का स्मरण नहीं होता