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Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 28, Verses 25–26

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 28, verses 25–26 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 28 · श्लोक 25,26

संस्कृत श्लोक

क्षणमैश्वर्यमायाति क्षणमेति दरिद्रताम् । क्षणं विगतरोगत्वं क्षणमागतरोगताम् ॥ २५ ॥ प्रतिक्षणविपर्यासदायिना निहतात्मना । जगद्भ्रमेण के नाम धीमन्तो हि न मोहिताः ॥ २६ ॥

हिन्दी अर्थ

मुनिवर, इस संसार मेँ क्षण भर में मनुष्य वैभवपूर्ण हो जाता है, क्षणभर में दरिद्र बन जाता है, क्षणभर में नीरोग हो जाता है ओर क्षण भर में ही रोग से आक्रान्त हो जाता है। गिरगिट के समान क्षणभर मेँ रंग बदलनेवाले नश्वर जगत्रूपी भ्रम से कौन बुद्धिमान्‌ जन मोहित नहीं हुए अर्थात्‌ इस गर्हित जगद्भरम ने सभी को मोह में डाल रक्खा है