Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 28, Verses 27–30

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 28, verses 27–30 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 28 · श्लोक 27-30

संस्कृत श्लोक

तमःपङ्कसमालब्धं क्षणमाकाशमण्डलम् । क्षण कनकनिष्यन्दकोमलालोकसुन्दरम् ॥ २७ ॥ क्षणं जलदनीलाब्जमालावलितकोटरम् । क्ष्रणमुड्डामररवं क्षणं मूकमिव स्थितम् ॥ २८ ॥ क्षणं ताराविरचितं क्षणमर्केण भूषितम् । क्षणमिन्दुकृताह्लादं क्षणं सर्वबहिष्कृतम् ॥ २९ ॥ आगमापायपरया क्षणसंस्थितिनाशया । न बिभेति हि संसारे धीरोऽपि क इवानया ॥ ३० ॥

हिन्दी अर्थ

इस जगत्‌ की अनियत स्थिति को ही उदाहरण द्वारा विशद करते है । आकाशमण्डल कभी निविड अन्धकार से आच्छन्न हो जाता है, कभी सुवर्णद्रव के समान उज्ज्वल चाँदनी आदि से उद्‌भासित हो उठता है, कभी मेघरूपी नीलकमल की माला से परिवृत्त हो जाता है, कभी गम्भीरतर बादलों की गर्जना से परिपूर्णं हो जाता है, कभी मृककी नाई सुनसान हो जाता है, कभी तारों की पंक्तियों से रंजित हो जाता है, कभी सूर्य की किरणों से विभूषित हो जाता है, कभी चाँदनीरूप आभूषण से अलंकृत हो उठता है ओर कभी पूर्वोक्त कोई भी पदार्थ उसमें नहीं रहते । क्या ये सब आकाश के स्वरूप है ? नहीं, वह तो रंग आदि से रहित हे, केवल उक्त प्रकार के आकारं को धारण करता है, आकाश दृष्टान्तय है । इसका दार्ष्टन्तिक संसार भी इसी भोति घोर मायामय (भ्रान्तिमय) हे । संसार का स्वरूप ठीक आकाश के सदृश हे हे महर्षे, आगम ओर अपाय के वशीभूत एवं क्षण में उत्पन्न और क्षण में नष्ट होनेवाली इस जगत्‌-स्थिति से कौन ऐसा पुरुष है, जो धीर होता हुआ भी इस संसार में भयभीत नहीं होता