Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 29, Verse 14
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 29, verse 14 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 29 · श्लोक 14
संस्कृत श्लोक
न सुखानि न दुःखानि न मित्राणि न बान्धवाः ।
न जीवितं न मरणं बन्धाय ज्ञस्य चेतसः ॥ १४ ॥
हिन्दी अर्थ
तत्त्वज्ञ पुरुष भी तो विषयों का भोग करते हुए सुखी आदि देखे जाते हैं, फिर उनमें कौन सी
विशेषता है, ऐसी शंका होने पर कहते है।
सुख, दुःख, मित्र, बन्धु, बान्धव, जीवन ओर मरण ये सब यद्यपि बन्धन के कारण है, तथापिये
ज्ञानी के चित्त के बन्धक नहीं होते, इसका कारण यही है कि ज्ञानी इनके वश में नहीं होते