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Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 29, Verse 15

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 29, verse 15 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 29 · श्लोक 15

संस्कृत श्लोक

तद्भवामि यथा ब्रह्मन्पूर्वापरविदां वर । वीतशोकभयायासो ज्ञस्तथोपदिशाशु मे ॥ १५ ॥

हिन्दी अर्थ

अतः सम्पूर्णदुःखो का मूलोच्छेदक होने के कारण ज्ञानी होना ही परम पुरुषार्थ है, अत: ज्ञानोपदेश की प्रार्थना करते हैं। हे ब्रह्मन्‌, हे तत्त्वज्ञशिरोमणे, इसलिए जैसे में ज्ञानी होकर शोक, भय और खेद से शीघ्र मुक्त हो जाऊँ, वैसा उपदेश मुझे शीघ्र दीजिये