Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 3, Verses 16–17
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 3, verses 16–17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 3 · श्लोक 16,17
संस्कृत श्लोक
जीवन्मुक्तिपदं प्राप्तो यथा रामो महामतिः ।
तत्तेऽहं शृणु वक्ष्याभि जरामरणशान्तये ॥ १६ ॥
भरद्वाज महाबुद्धे रामक्रममिमं शुभम् ।
शृणु वक्ष्यामि तेनैव सर्वं ज्ञास्यसि सर्वदा ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
हे महामति भरद्वाज, महाबुद्धि श्रीरामचन्द्रजी जिस प्रकार जीवन्मुक्ति पद को प्राप्त
हुए, उसे मैं जीव के जरा और मरण की शांति के लिए तुमसे कहूँगा, सुनो । श्रीरामचन्द्रजी की
परममंगलदायिनी इस कथा का श्रवण करो, इसके श्रवण से ही तुम सम्पूर्ण तत्त्व को जान
जाओगे