Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 3, Verse 20
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 3, verse 20 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 3 · श्लोक 20
संस्कृत श्लोक
तीर्थपुण्याश्रमश्रेणीर्द्रष्टुमुत्कण्ठितं मनः ।
रामस्याभूद्भृशं तत्र कदाचिद्गुणशालिनः ॥ २० ॥
हिन्दी अर्थ
यह सूचित करने के लिए (विगतज्वरम्” पद दिया है।
उस समय महागुणशाली श्रीरामचन्द्रजी का मन तीर्थ और पुण्याश्रम देखने के लिए अत्यन्त उत्कण्ठित
हुआ। (८)