Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 3, Verse 21
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 3, verse 21 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 3 · श्लोक 21
संस्कृत श्लोक
राघवश्चिन्तयित्वैवमुपेत्य चरणौ पितुः ।
हंसः पद्माविव नवौ जग्राह नखकेसरौ ॥ २१ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीरामचन्द्रजी ने पुण्य तीर्थो के दर्शन का यों विचार कर श्रीपितृचरणों के (श्रीमहाराज
दशरथ के) निकट जाकर जैसे हंस नवीन कमलों का आश्रय लेता है वैसे ही पिताजी के नखरूपी केसर
से सुशोभित चरणकमलों को ग्रहण किया