Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 33, Verses 1–2
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 33, verses 1–2 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 33 · श्लोक 1-2
संस्कृत श्लोक
सिद्धा ऊचुः ।
पावनस्यास्य वचसः प्रोक्तस्य रघुकेतुना ।
निर्णयं श्रोतुमुचितं वक्ष्यमाणं महर्षिभिः ॥ १ ॥
नारदव्यासपुलहप्रमुखा मुनिपुङ्गवाः ।
आगच्छताश्वविघ्नेन सर्व एव महर्षयः ॥ २ ॥
हिन्दी अर्थ
सिद्धो द्वारा की गई श्रीरामचन्द्रजी के वचनो की श्लाघा को ही विश्कलित कर रहे महामुनि
वाल्मीकिजी प्रश्न के उत्तर को सुनने की उनकी अभिलाषा और सभाप्रवेश आदिका वर्णन करने के
लिए इस सर्ग का आरम्भ करते है।
सिद्धो ने कहा : रघुकुलतिलक श्रीरामचन्द्रजी द्वारा उक्त इन पवित्रतम प्रश्नवाक्यों का महर्षि लोग
जो निर्णय करेगे, उसे अवश्य सुनना चाहिए । हे नारद, व्यास, पुलह आदि मुनिश्रेष्ठो ओर सम्पूर्ण
महर्षियों, आप लोग उसे निर्विघ्न सुनने के लिए शीघ्र पधारो
सर्ग सन्दर्भ
बत्तीसवाँ सर्ग समाप्त तैंतीसवाँ सर्ग सभा में सिद्ध पुरुषों का शुभागमन और अपनी अपनी योग्यता के अनुकूल स्थान में बैठे हुए सिद्धों द्वारा श्रीरामचन्द्रजी के वचनों की प्रशंसा ।