Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 33, Verse 3
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 33, verse 3 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 33 · श्लोक 3
संस्कृत श्लोक
पतामः परितः पुण्यामेतां दाशरथीं सभाम् ।
नीरन्ध्रां कनकोद्योतां पद्मिनीमिव षट्पदाः ॥ ३ ॥
हिन्दी अर्थ
कल्याणकारी कार्यो में बहुत विघ्न उपस्थित हो जाते हैं, इसलिए विलम्ब करना उचित नहीं है,
यह भाव है।
जैसे भँवरे कमलों से खचाखच भरे हुए, सुवर्ण के सदुश पीले केसर से दैदीप्यमान एवं पवित्र
कमलों के तालाब में चारों ओर से जाते हैं, वैसे ही हम लोग भी पवित्रतम, धन-सम्पत्तिसे परिपूर्ण
अतएव सुवर्ण से चमचमा रही महाराज दशरथ की इस सभामें चारों ओर से जायें