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Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 4, Verses 1–2

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 4, verses 1–2 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 4 · श्लोक 1,2

संस्कृत श्लोक

श्रीवाल्मीकिरुवाच । रामः पुष्पाञ्जलिव्रातैर्विकीर्णः पुरवासिभिः । प्रविवेश गृहं श्रीमाञ्जयन्तो विष्टपं यथा ॥ १ ॥ प्रणनामाथ पितरं वसिष्ठं भ्रातृबान्धवान् । ब्राह्मणान्कुलवृद्धांश्च राघवः प्रथमागतः ॥ २ ॥

हिन्दी अर्थ

पुत्र) स्वर्ग मेँ (अमरावती में) प्रवेश करता है वैसे ही अपने घर में प्रविष्ट हुए । तदुपरान्त प्रथम प्रवास से लौटे हुए रामजी ने पिताजी को, कुलगुरू वशिष्ठजी को, भाई-बन्धुओं को, ब्राह्मणों को, कुल के बड़े-बूढ़ों को यथायोग्य प्रणाम किया