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Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 4, Verse 10

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 4, verse 10 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 4 · श्लोक 10

संस्कृत श्लोक

तत आगत्य सदने कृत्वा स्नानादिकं क्रमम् । समित्रबान्धवो भुक्त्वा निनाय ससुहृन्निशाम् ॥ १० ॥

हिन्दी अर्थ

वहाँ से घर लौटकर स्नान आदि कर्म कर तथा मित्र ओर बन्धुओं के साथ भोजन कर मित्रों के साथ रात्रि बिताते थे