Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 4, Verses 11–12
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 4, verses 11–12 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 4 · श्लोक 11,12
संस्कृत श्लोक
एवंप्रायदिनाचारो भ्रातृभ्यां सह राघवः ।
आगत्य तीर्थयात्रायाः समुवास पितुर्गृहे ॥ ११ ॥
नृपतिसंव्यवहारमनोज्ञया सुजनचेतसि चन्द्रिकयानया ।
परिनिनाय दिनानि स चेष्टया स्तुतसुधारसपेशलयाऽनघ ॥ १२ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीरामचन्द्रजी तीर्थयात्रा से लौटकर लक्ष्मण और शत्रुघ्न के साथ प्रायः इस प्रकार की दिनचर्या
करते हुए पिताजी के घर में सुखपूर्वक रहते थे। हे भरद्वाज, श्रीरामचन्द्रजी राजाओं के योग्य व्यवहार
से मनोहर, सज्जनों के चित्त को चाँदनी के समान आनन्द देनेवाली, श्लाघनीय एवं अमृतद्रव के
समान सुन्दर चेष्टा से कालयापन करते थे