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Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 5, Verses 1–7

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 5, verses 1–7 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 5 · श्लोक 1-7

संस्कृत श्लोक

श्रीवाल्मीकिरुवाच । अथोनषोडशे वर्षे वर्तमाने रघूद्वहे । रामानुयायिनि तथा शत्रुघ्ने लक्ष्मणेऽपि च ॥ १ ॥ भरते संस्थिते नित्यं मातामहगृहे सुखम् । पालयत्यवनिं राज्ञि यथावदखिलाभिमाम् ॥ २ ॥ जन्यत्रार्थं च पुत्राणां प्रत्यहं सह मन्त्रिभिः । कृतमन्त्रे महाप्राज्ञे तज्ज्ञे दशरथे नृपे ॥ ३ ॥ कृतायां तीर्थयात्रायां रामो निजगृहे स्थितः । जगामानुदिनं कार्श्यं शरदीवामलं सरः ॥ ४ ॥ कुमारस्य विशालाक्षं पाण्डुतां मुखमाददे । पाकफुल्लदलं शुक्लं सालिमालमिवाम्बुजम् ॥ ५ ॥ कपोलतलसंलीनपाणिः पद्मासनस्थितः । चिन्तापरवशस्तूष्णीमव्यापारो बभूव ह ॥ ६ ॥ कृशाङ्गश्चिन्तया युक्तः खेदी परमदुर्मनाः । नोवाच कस्यचित्किंचिल्लिपिकर्मार्पितोपमः ॥ ७ ॥

हिन्दी अर्थ

से युक्त पाकावस्था में अधिक खिला हुआ सफेद कमल पीला हो जाता है, वैसे ही राजकुमार का विशाल नेत्रों से युक्त मुख पीला पड़ गया। कपोल में हाथ रक्खे हुए और पद्मासन से बैठे श्रीरामजी सदा चिन्ता से ग्रस्त चुपचाप ओर निश्चेष्ट रहते थे उनका शरीर कृश हो गया था, चिन्ता उन्हें नहीं छोड़ती थी, वे सदा दुःखी और उदास रहते थे । चित्रलिखित के समान वे किसी से कुछ बोलते भी न थे