Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 5, Verse 8
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 5, verse 8 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 5 · श्लोक 8
संस्कृत श्लोक
खेदात्परिजनेनासौ प्रार्थ्यमानः पुनः पुनः ।
चकाराह्निकमाचारं परिम्लानमुखाम्बुजः ॥ ८ ॥
हिन्दी अर्थ
परिजनों के बार बार प्रार्थना करने पर कष्ट से स्नान, सन्ध्यावन्दन आदि अवश्य कर्तव्य दैनिक कर्म
करते थे, उनका मुखकमल म्लान हो गया था