Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 5, Verse 15
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 5, verse 15 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 5 · श्लोक 15
संस्कृत श्लोक
कोपं विषादकलनां विततं च हर्षं नाल्पेन कारणवशेन वहन्ति सन्तः ।
सर्गेण संहृतिजवेन विना जगत्यां भूतानि भूप न महान्ति विकारवन्ति ॥ १५ ॥
हिन्दी अर्थ
(यहाँ पर रामचन्द्रजी की चिन्ता का फल शुभ होगा, यह दशनि के लिए श्रीमन्" सम्बोधन है ।)
जैसे संसार में पृथिवी, जल आदि महाभूत सृष्टि ओर प्रलय के बिना छोटे-मोटे कारणों से वृद्धि
ओर क्षयरूप विकार को प्राप्त नहीं होते, वैसे ही सत्पुरुष भी छोटे-मोटे कारणों से क्रोध, विषाद ओर
हर्ष के वशीभूत नहीं होते