Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 6, Verses 30–31
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 6, verses 30–31 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 6 · श्लोक 30
संस्कृत श्लोक
एवं प्रकथयन्तोऽत्र राजानोऽथ महर्षयः ।
आसनेषु सभास्थानमासाद्य समुपाविशन् ॥ ३० ॥
स दृष्ट्वा मालितं लक्ष्म्या भीतस्तमृषिसत्तमम् ।
प्रहृष्टवदनो राजा स्वयमर्घ्यं न्यवेदयत् ॥ ३१ ॥
हिन्दी अर्थ
यों महाराज दशरथ के समान ही कह
रहे महर्षि और अन्य राजा सभाभवन में आकर आसनं पर बैठ गये