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Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 6, Verses 38–41

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 6, verses 38–41 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 6 · श्लोक 38-41

संस्कृत श्लोक

अर्चयित्वा तु विधिवद्विश्वामित्रमभाषत । प्राञ्जलिः प्रयतो वाक्यमिदं प्रीतमना नृपः ॥ ३८ ॥ यथाऽमृतस्य संप्राप्तिर्यथा वर्षमवर्षके । यथान्धस्येक्षणप्राप्तिर्भवदागमनं तथा ॥ ३९ ॥ यथेष्टदारसंपर्कात्पुत्रजन्माऽप्रजावतः । स्वप्नदृष्टार्थलाभश्च भवदागमनं तथा ॥ ४० ॥ यथेप्सितेन संयोग इष्टस्यागमनं यथा । प्रणष्टस्य यथा लाभो भवदागमनं तथा ॥ ४१ ॥

हिन्दी अर्थ

विधिपूर्वक पूजकर प्रसन्नचित्त पुण्यात्मा राजा ने हाथ जोड़ कर विश्वामित्रजी से ये वाक्य कहे : भगवन्‌, मरणधर्मा जीव को अमृत लाभ से जैसा सुख होता हे, दीर्घकाल की अनावृष्टि के अनन्तर वृष्टि के लाभ से किसान को जैसा आनन्द होता है एवं अन्धे को नयनप्राप्ति से जैसा हर्ष होता है हमारे लिए आपका शुभागमन वैसा ही, उससे भी बढ़कर आनन्दप्रद हे । पुत्रविहीन व्यक्ति को धर्मपत्नी से पुत्रोत्पत्ति होने पर जैसा आह्वाद होता है, दरिद्र पुरुष को स्वप्न में दृष्ट धन का लाभ होने पर जैसा आनन्द होता है, वैसे ही आपका आगमन हमारे लिए सुखकारक हे । मनुष्य चिरकाल से इच्छित मणि, मन्त्र, अभ्युदय आदि की प्राप्ति, प्रियतम भाई, पुत्र आदि के समागम ओर खोई गई वस्तु के लाभ से जैसे अनिर्वचनीय आह्नाद का अनुभव करते हैं, वैसे ही आपके आगमन से हमें आह्णाद हो रहा है