Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 6, Verse 52
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 6, verse 52 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 6 · श्लोक 52
संस्कृत श्लोक
यत्कार्यं येन वार्थेन प्राप्तोऽसि मुनिपुङ्गव ।
कृतमित्येव तद्विद्धि मान्योऽसीति सदा मम ॥ ५२ ॥
हिन्दी अर्थ
मुनिवर,
आपका जो कार्य हो, जिस प्रयोजन से आप आये हैँ, उसे आप किया ही समझिए, क्योकि आप सर्वदा
मेरे माननीय है