Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 6, Verses 53–54
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 6, verses 53–54 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 6 · श्लोक 53,54
संस्कृत श्लोक
स्वकार्ये न विमर्शं त्वं कर्तुमर्हसि कौशिक ।
भगवन्नास्त्यदेयं मे त्वयि यत्प्रतिपद्यते ॥ ५३ ॥
कार्यस्य न विचारं त्वं कर्तुमर्हसि धर्मतः ।
कर्ता चाहमशेषं ते दैवतं परमं भवान् ॥ ५४ ॥
हिन्दी अर्थ
गाधिनन्दन, अपने कार्य के विषय में आप विचार न कीजिए । भगवन्, पात्रभूत
आपके लिए मुझे कुछ भी अदेय नहीं है । मेरा कार्य सिद्ध होगा या नहीं, इसका विचार आप मत कीजिए ।
मैं आपका कार्य सम्पूर्णरूप से धर्मतः करूँगा | आप मेरे परम देव है