Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 7, Verses 1–2
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 7, verses 1–2 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 7 · श्लोक 1,2
संस्कृत श्लोक
श्रीवाल्मीकिरुवाच ।
तच्छ्रुत्वा राजसिंहस्य वाक्यमद्भुतविस्तरम् ।
हृष्टरोमा महातेजा विश्वामित्रोऽभ्यभाषत ॥ १ ॥
सदृशं राजशार्दूल तवैवैतन्महीतले ।
महावंशप्रसूतस्य वसिष्ठवशवर्तिनः ॥ २ ॥
हिन्दी अर्थ
वाल्मीकिजी ने कहा : भरद्वाज, महाराज के आश्चर्यपूर्ण उक्त विस्तृत वाक्य को सुनकर महामुनि
विश्वामित्रजी के शरीर में रोमांच छा गये । उन्होंने पुलकित होकर राजा से कहा : महाराज, भूलोक में ऐसा
वाक्य आपके ही योग्य है, क्योकि आप महावंश में उत्पन्न हुए हैं और गुरु वसिष्ठजी के आज्ञाकारी
हैं
सर्ग सन्दर्भ
छठर्वौ सर्ग समाप्त सातवाँ सर्ग राजा की प्रशंसा कर श्रीविश्वामित्रजी का अपने आगमन का प्रयोजन कहना तथा राक्षसो के विनाश के लिए श्रीरामचन्द्रजी को माँगना |