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Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 7, Verses 19–20

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 7, verses 19–20 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 7 · श्लोक 19,20

संस्कृत श्लोक

न च पुत्रकृतं स्नेहं कर्तुमर्हसि पार्थिव । न तदस्ति जगत्यस्मिन्यन्न देयं महात्मनाम् ॥ १९ ॥ हन्त नूनं विजानामि हतांस्तान्विद्धिराक्षसान् । नह्यस्मदादयः प्राज्ञाः संदिग्धे संप्रवृत्तयः ॥ २० ॥

हिन्दी अर्थ

महाराज, आप यह मेरा पुत्र है ऐसा प्राकृत स्नेह न कीजिए, क्योकि संसार में महात्मा पुरुषों के लिए कोई वस्तु अदेय नहीं हे । महाराज, तपोबल से निस्सन्देह जानता हूँ और आप भी मेरे वचन से जानिये कि विघ्नकारी सम्पूर्ण राक्षस मरे हुए ही हैं, क्योंकि मेरे सदृश महामति पुरुषों की संदिग्ध विषय में प्रवृत्ति ही नहीं होती