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Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 7, Verses 5–7

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 7, verses 5–7 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 7 · श्लोक 5-7

संस्कृत श्लोक

यदा यदा तु यज्ञेन यजेऽहं विबुधव्रजान् । तदा तदा तु मे यज्ञं विनिघ्नन्ति निशाचराः ॥ ५ ॥ बहुशो विहिते तस्मिन्मया राक्षसनायकाः । अकिरंस्ते महीं यागे मांसेन रुधिरेण च ॥ ६ ॥ अवधूते तथाभूते तस्मिन्यागकदम्बके । कृतश्रमो निरुत्साहस्तस्माद्देशादुपागतः ॥ ७ ॥

हिन्दी अर्थ

जब-जब मैं यज्ञ द्वारा देवताओं का भजन पूजन करता हूँ तब तव राक्षस मेरे यज्ञ को छिन्न भिन्न कर देते हैँ । मेरे बहुत बार यज्ञ आरम्भ करने पर राक्षस नायको ने यज्ञभूमि को मांस और रक्त से पाट दिया। मेरे यज्ञं के यों विघ्नो द्वारा छिन्न भिन्न होने पर मेरा उत्साह जाता रहा । इस बार फिर मैंने यज्ञ का आरम्भ किया है, उसके प्रतीकार के लिए आपके पास आया हूँ