Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 8, Verse 22
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 8, verse 22 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 8 · श्लोक 22
संस्कृत श्लोक
चतुर्णामात्मजानां हि प्रीतिरत्रैव मे परा ।
ज्येष्ठं धर्ममयं तस्मान्न रामं नेतुमर्हसि ॥ २२ ॥
हिन्दी अर्थ
चार पुत्रों मँ से रामचन्द्र के ऊपर ही मेरा सर्वाधिक प्रेम हे, क्योकि वह
सर्वज्येष्ठ ओर धर्मात्मा है । इसलिए राम को आप मत ले जाड्ये