Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 8, Verses 20–21
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 8, verses 20–21 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 8 · श्लोक 20,21
संस्कृत श्लोक
प्रधानभूतस्तेष्वेव रामः कमललोचनः ।
तं विनेह त्रयोऽप्यन्ये धारयन्ति न जीवितम् ॥ २० ॥
स एव रामो भवता नीयते राक्षसान्प्रति ।
यदि तत्पुत्रहीनं त्वं मृतमेवाशु विद्धि माम् ॥ २१ ॥
हिन्दी अर्थ
इन चारों मेँ कमलनयन राम सर्वप्रधान है,
उसके बिना उसके तीन भाई भी नहीं जी सकेंगे जिसको ले जाने से अवशिष्ट तीनों का भी मरण
अवश्यम्भावी है, उस श्रीराम को आप मृत्युरूप राक्षसं के समीप ले जा रहे हैं, तो चारों पुत्रों से हीन मुझे
आप मरा ही जानिये