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Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 9, Verses 7–8

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 9, verses 7–8 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 9 · श्लोक 7,8

संस्कृत श्लोक

वसिष्ठ उवाच । इक्ष्वाकूणां कुले जातः साक्षाद्धर्म इवापरः । भवान्दशरथः श्रीमांस्त्रैलोक्यगुणभूषितः ॥ ७ ॥ धृतिमान्सुव्रतो भूत्वा न धर्मं हातुमर्हसि । त्रिषु लोकेषु विख्यातो धर्मेण यशसा युतः ॥ ८ ॥

हिन्दी अर्थ

वसिष्ठजी ने कहा : हे राजन्‌, तुम इक्ष्वाकु वंश में साक्षात्‌ दूसरे धर्म के सदृश उत्पन्न हुए हो । अनेक प्रकार की लक्ष्मी से सम्पन्न हो, तीनों लोकों में सज्जनों के जो उत्तमोत्तम गुण हैं उनसे परिपूर्ण हो, धीर और प्रतिज्ञापालन आदि अच्छे व्रतों का अनुष्ठान करते हो, इसलिए तुम्हें धर्म का परित्याग नहीं करना चाहिए क्योंकि स्वर्ग, मृत्यु और पाताल-इन तीनों लोको में तुम अपने धर्माचरण से और यश से विख्यात हो