Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 9, Verse 6
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 9, verse 6 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 9 · श्लोक 6
संस्कृत श्लोक
क्रोधाभिभूतं विज्ञाय जगन्मित्रं महामुनिम् ।
धृतिमान्सुव्रतो धीमान्वसिष्ठो वाक्यमब्रवीत् ॥ ६ ॥
हिन्दी अर्थ
(पथिवी अपने मन में यह सोचकर भय के मारे कोपने लगी कि दशरथ मेरे स्वामी हैं, उन्होने अपनी
प्रतिज्ञा का पालन न कर विश्वामित्र का बड़ा भारी अपराध किया है और अपराधी दशरथ को मैंने धारण
किया है, अतः इस प्रकार के सम्बन्ध का विचार कर, मुझे भी अपनी अपराधिनी समझ कर कदाचित्
शाप न दें। देवताओं को इस विचार से भय हुआ कि विश्वामित्र क्रोध में आकर अपने तप के प्रभाव से
दूसरे रामचंद्र को उत्पन्न कर रावणवध के लिए उसीको यदि प्रेरित कर देंगे, तो बड़ा भारी अनर्थ होगा,
क्योकि नवीन रामचन्द्र के साथ हम लोगों का कोई सम्बन्ध नहीं है, अतः अन्त में वह हमारे ऊपर भी
आक्रमण कर सकता है।)
जगत् के मित्र महामुनि विश्वामित्र को क्रोध से अभिभूत याने क्रोधपूर्ण देखकर धैर्य आदि गुणों से
सम्पन्न, उत्तम व्रतों का अनुष्ठान करनेवाले बुद्धिमान् महर्षि वसिष्ठ निम्ननिर्दिष्ट वाक्य बोले