Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 1, Verses 3–4
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण, सर्ग 1, verses 3–4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 1 · श्लोक 3,4
संस्कृत श्लोक
केवलं मार्जनामात्रं मनागेवोपयुज्यते ।
स्वभावविमले नित्यं स्वबुद्धिमुकुरे तव ॥ ३ ॥
भगवद्व्यासपुत्रस्य शुकस्येव मतिस्तव ।
विश्रान्तिमात्रमेवान्तर्ज्ञातज्ञेयाप्यपेक्षते ॥ ४ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि उक्त परमात्मतत्त्व का ज्ञान हो गया है, तो विश्रान्ति क्यो नहीं प्राप्त हुई ?
स्वभावतः निर्मल तुम्हारे बुद्धिरूपी दर्पण में केवल तनिक अविश्वास और सन्देहरूपी मलिनता के
निराकरण की आवश्यकता है, क्योकि अपनी बुद्धि से परमात्मतत्त्व ज्ञात होने पर भी शास्त्र और आचार्य
आदि के संवाद के बिना विश्वास नहीं होता। कहा भी है कि (बलवदपि शिक्षितानामात्मन्यप्रत्ययं चेतः“
(भलीभाँति शिक्षित लोगों का भी चित्त अपने विषय में विश्वास नहीं करता) । भगवान वेदव्यासजी के
सुपुत्र श्री शुकदेवजी की ([-)) बुद्धि की नाई तुम्हारी बुद्धि ने भी ज्ञातव्य वस्तु को जान लिया है। अब
केवल मात्र विश्रान्ति की उसे अपेक्षा है