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Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 1, Verse 5

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण, सर्ग 1, verse 5 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 1 · श्लोक 5

संस्कृत श्लोक

श्रीराम उवाच । भगवद्व्यासपुत्रस्य शुकस्य भगवन्कथम् । ज्ञेयेऽप्यादौ न विश्रान्तं विश्रान्तं च धिया पुनः ॥ ५ ॥

हिन्दी अर्थ

श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : भगवान्‌ श्री व्यासजीके पुत्र श्रीशुकदेवजी की अपने ही विचार से ज्ञातव्य तत्त्व में कैसे विश्रान्ति नहीं हुई और गुरु के उपदेश द्वारा & मुख्य अधिकारी दुर्लभ है, इसलिए रामचन्द्रजी में श्रीविश्वामित्रजी की प्रीति हुई और वे स्वयं ब्रह्मविद्या के महान्‌ रसज्ञ थे, इसलिए आगे कही जानेवाली ब्रह्मविद्या की चर्चा में उनकी प्रीति थी, अतएव वे प्रीति से बोले । (3 यहाँ पर श्रीवेदव्यासजी और श्री शुकदेवजी पूर्व द्वापर के अन्त में उत्पन्न हुए लिये जाते हैं, क्योंकि प्रत्येक द्वापर के अन्त में व्यासजी का अवतार होता है, यह प्रसिद्ध है। प्राप्त संवादिनी बुद्धि से फिर कैसे उनको विश्रान्ति प्राप्त हुई ?