Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 1, Verses 34–36
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण, सर्ग 1, verses 34–36 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 1 · श्लोक 34
संस्कृत श्लोक
तत्किमेतन्महाबाहो सत्यं ब्रूहि ममाचलम् ।
त्वत्तो विश्रान्तिमाप्नोमि चेतसा भ्रमता जगत् ॥ ३४ ॥
जनक उवाच ।
नातः परतरः कश्चिन्निश्चयोऽस्त्यपरो मुने ।
स्वयमेव त्वया ज्ञातं गुरुतश्च पुनः श्रुतम् ॥ ३५ ॥
अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् ।
स्वसंकल्पवशाद्बद्धो निःसंकल्पश्च मुच्यते ॥ ३६ ॥
हिन्दी अर्थ
अथवा-स्वप्रकाशरूप आत्मा में तीनो कालों मे बाधित होने ओर मिथ्या होने के कारण यह संसार
(3) उक्त श्लोक का विशद अर्थ यों है : स्व में अज्ञान से उपहित आत्मा में विविध प्रकार के
प्रपंच की कल्पना करनेवाला विकल्प है अर्थात् अन्तःकरण, जो कि अनन्त काम, कर्म ओर वासनाओं
के बीजों से परिपूर्ण है, सुषुप्ति अवस्था में केवल समष्टि तथा व्यष्टि संस्कारों से अवशिष्ट रहकर
अव्याकृत में लीन हो जाता है ओर जीवभाव की उपाधि है । उस अन्तःकरण से प्रलय-क्रम से
विपरीत क्रम से अर्थात् पहले अपंचीकृत आकाश आदि की उत्पत्ति के क्रम से समष्टिहिरण्यगर्भरूप
से, तदनन्तर पंचीकरण द्वारा विराटरूप से, तदुपरान्त अन्नादि के क्रम से व्यष्टिस्थूलदेहरूप से ओर
उसके अन्दर व्यष्टि लिंगदेहरूप से आविर्भूत हुआ यह निन्दित संसार महाअनर्थरूप है । यह केवल
कर्म ओर उपासना के अनुष्ठान से व्यष्टिभाव की जननी वासना का विनाश होनेपर
समष्टिहिरण्यगर्भरूप से अवशिष्ट रहता है तथा श्रवण आदि के परिपाक से उत्पन्न तत्वसाक्षात्कार
से वासनासहित कार्यकारणरूप अविद्या का नाश होनेपर मूलोच्छेदपूर्वक अन्तःकरण का आत्यन्तिक
विनाश होने के कारण सर्वथा नष्ट हो जाता है | मूलस्थित दग्धशब्द निन्दा का वाचक है ।
प्रथमतः दग्धप्राय अतएव निस्सार है, फिर साक्षात्काररूपी प्रलयाग्नि से, चारों ओर से परिवेष्टित होने
पर कैसे रह सकता है, यह भाव है।
श्री शुकदेवजी ने कहा : हे महाबाहो, जिसे मैंने स्वयं ही पहले विचार द्वारा जाना है, क्या वही सत्य
तत्त्व है ? यदि वही सत्य तत्त्व है, तो वह जिस प्रकार निःसन्देरूप से मेरे हृदय में जम जाय, उस प्रकार
उसका मुझे उपदेश दीजिए यह तत्त्वपदार्थ है या यह तत्त्वपदार्थ है, यों अविश्वास से नाना विषयों में
चक्कर काट रहे चित्त ने मुझे भ्रम में डाल रक्खा है। चित्त द्वारा इस जगत् में भ्रमित मैं आपसे शान्तिलाभ
कर सकूँगा