Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 1, Verses 37–40
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण, सर्ग 1, verses 37–40 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 1 · श्लोक 37-40
संस्कृत श्लोक
तेन त्वया स्फुटं ज्ञातं ज्ञेयं यस्य महात्मनः ।
भोगेभ्यो विरतिर्जाता दृश्यात्प्राक्सकलादिह ॥ ३७ ॥
तव बाल महावीर मतिर्विरतिमागता ।
भोगेभ्यो दीर्घरोगेभ्यःकिमन्यच्छ्रोतुमिच्छसि ॥ ३८ ॥
न तथा पूर्णता जाता सर्वज्ञानमहानिधेः ।
तिष्ठतस्तपसि स्फारे पितुस्तव यथा तव ॥ ३९ ॥
व्यासादधिक एवाहं व्यासशिष्योऽसि तत्सुतः ।
भोगेच्छातानवेनेह मत्तोऽप्यत्यधिको भवान् ॥ ४० ॥
हिन्दी अर्थ
श्री जनकजी ने कहा : मुनिश्रेष्ठ, आपने स्वयं विचारपूर्वक जिस तत्त्व को जाना है
और जिसका गुरुमुख से श्रवण किया है, उससे अतिरिक्त दूसरा कोई ज्ञातव्य तत्त्व नहीं है ॥ ३ ५॥
दृढ़ निश्चय होने के लिए पुनः उसी बात को कहते हैं।
हे शुकदेव, इस सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में सर्वव्यापक, चिन्मय एकमात्र परम पुरुष परमात्मा ही है, उसके
सिवा अन्य कुछ नहीं है। वही अद्वितीय परमात्मा अपने संकल्प से संसाररूप बन्धन में पड़ा है और जब
वह संकल्परहित हो जाता है तव मुक्त हो जाता है॥ ३ ५॥ मुनिश्रेष्ठ, आपने ज्ञातव्य तत्व को भली-भाँति
जान लिया है। आप बड़े महात्मा हैं, क्योंकि आपको तत्त्वनिश्चयदशा में भोग भोगने से पूर्व ही सम्पूर्ण
दृश्य प्रपंच से वैराग्य हो गया है। भगवन्, आप बालक होते हुए भी विषयों के त्याग मेँ शूरवीर होने के कारण
महावीर है, अतएव दीर्घरोग के तुल्य भोगों से आपकी मति विरक्त हो गई है, अब आप क्या सुनना चाहते
हैं ? जिसे सुनने के लिए आप व्यग्र थे, आपके उस जिज्ञासित विषय को मेँ आपसे कह चुका। इस समय
क्या सुनने के लिए आप इच्छुक हैं ? उसे मुझसे कहिए । आपके पितृचरण व्यासजी सम्पूर्ण ज्ञानं के
महासागर हैं और असीम तपस्या में संलग्न हैं, पर जैसे पूर्णज्ञानी आप हुए हैं वैसे पूर्ण ज्ञानी वे नहीं हुए
हैं (८) । श्री व्यासदेवजी का शिष्य मैं श्रीव्यासजी से भी बढ़कर हूँ, क्योकि उनके पुत्र ओर शिष्य आप
मेरे शिष्य हुए हैँ । आपमें भोगों की इच्छा इतनी अल्प मात्रा में है कि उसका वर्णन नहीं किया जा सकता ।
उक्त भोगेच्छा की न्यूनता से आप मुझसे भी कहीं बढ़कर है । ([])