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Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 1, Verse 41

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण, सर्ग 1, verse 41 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 1 · श्लोक 41

संस्कृत श्लोक

प्राप्तं प्राप्तव्यमखिलं भवता पूर्णचेतसा । न दृश्ये पतसि ब्रह्मन्मुक्तस्त्वं भ्रान्तिमुत्सृज ॥ ४१ ॥

हिन्दी अर्थ

ब्रह्मन्‌, आपको जो पाना था, उसे आप पा गये है । इस समय आपका चित्त परिपूर्ण है आप अब दृश्य वस्तु में निमग्न नहीं हैं, दृश्य वस्तु में निमग्न होना ही संसारपतन हे, क्योकि "उदरमन्तरं कुरुते अथ तस्य भयं भवति" (जो तनिक भी आत्मा में भेद करता है उसे भय होता है) ऐसी श्रुति है । अतः आप मुक्त हो गये हैं, इसलिए कोई ओर भी ज्ञातव्य वस्तु है, ऐसी भ्रान्ति का त्याग कीजिये