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Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 11, Verses 21–24

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण, सर्ग 11, verses 21–24 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 11 · श्लोक 21-24

संस्कृत श्लोक

सर्वस्यैव हिं सर्वस्य साधोर्रांपे विवेकिनः । निमित्तपूर्वं वैराग्यं जायते राम राजसम् ॥ २१ ॥ इदं त्वपूर्वमुत्पन्न चमत्कारकरं । तवानिमित्तं वैराग्यं सात्त्विकं स्वविवेकजम् ॥ २२ ॥ बीभत्सं विषयं दृष्ट्वा कौ नाम न विरज्यते । सतामुत्तमवैराग्य विवेकादेव जायते ॥ २३ ॥ ते महान्तौ महाप्राज्ञा निमित्तेन विनैव हि । वैराग्यं जायते येषां तेषां ह्यमलमानसम् ॥ २४ ॥

हिन्दी अर्थ

हे श्रीरामचन्द्र, सम्पूर्ण विवेकी पुरुषों में सर्वश्रेष्ठ रूप से विख्यात साधु का सब विषयों में दृष्टनिमित्तपूर्वक ही राजस ([=्‌) वैराग्य होता है। श्रीरामजी, सत्पुरुषो को भी आश्चर्य में डालनेवाला अपने विवेक से उत्पन्न आपका यह सात्विक (>) वैराग्य किसी निमित्त के बिना ही उत्पन्न हुआ है, ऐसा पहले कभी नहीं देखा गया है । बीभत्स (घृणाजनक) विषयों को देखकर किसको वैराग्य नहीं होता, किन्तु सत्पुरुषों का उत्तम वैराग्य विवेक से ही होता है। वे महापुरुष हैं, वे महाविद्वान हैं और उन्हीं का चित्त गंगाजल के समान निर्मल है, जिन्हे निमित्तके बिना ही वैराग्य होता हे