Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 11, Verses 31–33
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण, सर्ग 11, verses 31–33 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 11 · श्लोक 31,32
संस्कृत श्लोक
क्रियाक्रमेण महता तपसा नियमेन च ।
दानेन तीर्थयात्राभिश्चिरकालं विवेकतः ॥ ३१ ॥
दुष्कृते क्षयमापन्ने परमार्थविचारणे ।
काकतालीययोगेन बुद्धिर्जन्तोः प्रवर्तते ॥ ३२ ॥
क्रियापरास्तावदलं चक्रावर्तिभिरावृताः ।
भ्रमन्तीह जना यावन्न पश्यन्ति परं पदम् ॥ ३३ ॥
हिन्दी अर्थ
-तपःप्रभावाद् देवप्रसादाच्च“ (तप के प्रताप से और देवता की प्रसन्नता से “यस्यदेवे परा
भक्तिः“ (जिसकी देवता पर परम भक्ति होती है) ओर ईश्वरानुग्रहादेव पुसामद्वैतवासना ।
प्रसादादेव रुद्रस्य भवानीसरहितस्य तु । अध्यात्मविषयं ज्ञानं जायते बहुजन्मभिः।“ (ईश्वर की
अनुकम्पा से लोगों की अद्वैतवासना होती है । श्रीभगवती पार्वती जी सहित भगवान् महादेवजी
के प्रसाद से ही बहुत जन्मो के पश्चात् अध्यात्म ज्ञान होता है) इत्यादि श्रुति ओर स्मृतियों का
अनुसरण करते हुए कहते हैं ।
परम प्रभु भगवान् श्रीमहादेवजी की प्रसन्नता से आप जैसे सज्जनो की शुभ बुद्धि विवेक
की ओर अग्रसर होती है ॥ ३ ०॥
"तमेतं वेदानुक्चनेन बराह्मणा विविदिषन्ति यज्ञेन दानेन तपसानाशकेन“ (उस परमात्मतत्त्व
को ब्राह्मण लोग वेदाध्ययन, यज्ञ, दान ओर अविनाशी तप से जानने की इच्छा करते हैं)
इत्यादि श्रुति के अनुसार कहते हैँ । गर्भाधान, पुंसवन, सीमन्तोन्नयन, जातकर्म, नामकरण,
अन्नप्राशन, चूडाकरण, उपनयन, चार वेदव्रत, समावर्तन, विवाह, पाँच महायज्ञो का
अनुष्ठान, अष्टका, पार्वण, श्राद्ध. उपाकरण, उत्सर्जन, चैत्र और आश्विन में होनेवाली
नवसस्येष्टि-ये सात पाकयज्ञ; अग्न्याधान, अग्निहोत्र, दर्श-पौर्णमास, चातुमस्यि,
आग्रयणेष्टि, निरूढ पशुबन्ध, सौत्रामणी - ये सात हविर्यज्ञः अग्निष्टोम, अत्यग्निष्टोम,
उक्थ्य, षोडसी, वाजपेय, अतिरात्र, आत्सोयमि - ये सात सोमयज्ञ, ये चालीस संस्कार और
सब भूर्तो में दया, क्षान्ति, अनसूया, शौच, आयासाभाव, मांगल्य, कार्पण्यका अभाव, अस्पृहा-
ये आठ गुण जिसके हों वह सायुज्य को प्राप्त होता है-यों गौतमस्मृति में दशयि गये
कर्मकाण्ड के क्रम से, विपुल तपस्यासे, इन्द्रिय, प्राण ओर मन के नियमन से, दान से,
तीर्थयात्राओं से ओर चिरकाल तक विचार करने से पापराशि के क्षीण होने के अनन्तर
परमात्मचिन्तन करनेपर काकतालीयन्याय से (कौए के आने ओर ताल के गिरने के समान)
संयोगतः सम्पन्न साधनों के संमिलन से प्राणी की बुद्धि विवेक की ओर अग्रसर होती
हे