Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 11, Verses 34–44
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण, सर्ग 11, verses 34–44 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 11 · श्लोक 34-44
संस्कृत श्लोक
यथाभूतमिदं दृष्ट्वा संसारं तन्मयीं धियम् ।
परित्यज्य परं यान्ति निरालाना गजा इव ॥ ३४ ॥
विषमेयमनन्तेह राम संसारसंसृतिः ।
देहयुक्तो महाजन्तुर्विना ज्ञानं न पश्यति ॥ ३५ ॥
ज्ञानयुक्तिप्लवेनैव संसाराब्धिं सुदुस्तरम् ।
महाधियः समुत्तीर्णा निमेषेण रघूद्वह ॥ ३६ ॥
तामिमां ज्ञानयुक्तिं त्वं संसाराम्भोधितारिणीम् ।
शृणुष्वावहितो बुद्ध्या नित्यावहितया तया ॥ ३७ ॥
यस्मादनन्तसंरम्भा जागत्यो दुःखभीतयः ।
चिरायान्तर्दहन्त्येता विना युक्तिमनिन्दिताम् ॥ ३८ ॥
शीतवातातपादीनि द्वन्द्वदुःखानि राघव ।
ज्ञानशक्तिं विना केन सह्यतां यान्ति साधुषु ॥ ३९ ॥
आपतन्ति प्रतिपदं यथाकालं दहन्ति च ।
दुःखचिन्ता नरं मूढं तृणमग्निशिखा इव ॥ ४० ॥
प्राज्ञं विज्ञातविज्ञेयं सम्यग्दर्शनमाधयः ।
न दहन्ति वनं वर्षासिक्तमग्निशिखा इव ॥ ४१ ॥
आधिव्याधिपरावर्ते संसारमरुमारुते ।
क्षुभितेऽपि न तत्त्वज्ञो भज्यते कल्पवृक्षवत् ॥ ४२ ॥
तत्त्वं ज्ञातुमतो यत्नाद्धीमानेव हि धीमता ।
प्रामाणिकः प्रबुद्धात्मा प्रष्टव्यः प्रणयान्वितम् ॥ ४३ ॥
प्रामाणिकस्य पृष्टस्य वक्तुरुत्तमचेतसः ।
यत्नेन वचनं ग्राह्यमंशुकेनेव कुङ्कुमम् ॥ ४४ ॥
हिन्दी अर्थ
ऐसी परिस्थिति में ब्रह्मजिज्ञासा के प्रयोजक विचार का उदय ही दुर्लभ है, यह भाव है।
जब तक परमपद का साक्षात्कार नहीं करते तब तक चक्र के समान लोगों को घुमानेवाले
राग-द्वेष आदि से आवृत्त लोग कर्मकाण्डपरायण होकर इस संसार में पुनः पुनः जन्म-मरणरूप
परम्परा को प्राप्त होते हैं ॥३ ३॥
श्रुति भी है “मन्तरे वर्तमान स्वयं धीराः“ (अविद्या मे स्थित अपने को पण्डित माननेवाले
मूढ जन अन्धो से ले जाये जा रहे अन्धो की नाईं पतन को प्राप्त होते हैं) ।
इस संसार को असार ओर दुःखरूप जानकर ओर संसारमयी बुद्धि का परित्यागकर विद्धान्
लोग बन्धन-स्तम्भ से निर्मुक्त हाथियों की नाई परब्रह्म को प्राप्त होते हैँ । हे श्रीरामचन्द्रजी,
वह संसारसूृष्टि विषम ओर असीम हे । देहाध्यास से युक्त महान् जीव भी कृमि, कीट आदि के
सदश ही हे । ज्ञान के विना परम पद को प्राप्त नहीं हो सकते । रघुवंशशिरोमणि, विवेकी लोग
ज्ञानरूपी नौका से ही सुदुस्तर संसारसागर को एक पलकभर में पार कर गये हैं । संसाररूपी
सागर से जीव को पार करानेवाले वक्ष्यमाण (आगे कहे जानेवाले) ज्ञानरूप उपाय को
विचाराभ्यासपरायण तथा विवेक, वैराग्य आदि से युक्त बुद्धि से एकाग्र होकर सुनिए | इस
अनिन्दित ज्ञानयुकिति के बिना अनन्त विक्षेपो से पूर्ण ये संसारिक दुःखभीतिर्यो चिरकाल तक
हृदय को सन्तप्त करती हैँ । हे राघव, साधुजन में शीत, वात, धूप आदि दु-खद्रन्द्र ज्ञानयुक्ति
को छोडकर किस उपाय से सह्य होते हैं ? अर्थात् ज्ञान से अतिरिक्त किसी उपाय से सह्य
नहीं होते । जैसे अग्नि की ज्वालाएँ तृण को जला डालती है, वैसे ही मूढ पुरुष को पदपद में
(क्षण-क्षण में) दुःख-चिन्ताएँ प्राप्त होती हैं और जला डालती हे । जैसे वर्षाकाल में सींचे गये
वन को अग्नि जला नहीं सकती, वैसे ही जिसने ज्ञातव्य वस्तु जान ली है, ऐसे विवेकशील
प्राज्ञ पुरुष को मानसिक व्यथाएँ सन्ताप नहीं पहुँचा सकती । शारीरिक ओर मानसिक पीडारूपी
बवंडर से परिपूर्ण संसारूपी मरुस्थल में प्रसिद्ध वायु के तेज चलने पर भी तत्त्वज्ञानी पुरुष
कल्पवृक्ष की नाई उखाडा नहीं जा सकता यानी पीडित नहीं होता । इसलिए तत्त्वपदार्थ के
ज्ञान के लिए बुद्धिमान् पुरुष को श्रुति आदि प्रमाण देने में अतिकुशल आत्मतत्त्वज्ञ बुद्धिमान्
पुरुष से ही अनुगमन, साष्टांग प्रणाम, सेवा आदिरूप प्रयत्न से विनयपूर्वक प्रश्न करना
चाहिए । जिज्ञासु द्वारा पूछे गये, श्रुति आदि प्रमाण देने मेँ निपुण ओर विशुद्ध चित्त वाले वक्ता
के वाक्य वैसे ग्रहण करने चाहिए जैसे कि रँगने के लिए घोले गये पक्के रंग में डुबाया गया वस्त्र
रंग को पकड़ लेता है फिर उसे कभी नहीं छोडता