Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 11, Verses 56–63
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण, सर्ग 11, verses 56–63 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 11 · श्लोक 56-63
संस्कृत श्लोक
मनो हि चपलं राम संसारवनमर्कटम् ।
संशोध्य हृदि यत्नेन श्रोतव्या परमार्थगीः ॥ ५६ ॥
अविवेकिनमज्ञानमसज्जनरतिं जनम् ।
चिरं दूरतरे कृत्वा पूजनीया हि साधवः ॥ ५७ ॥
नित्यं सज्जनसंपर्काद्विवेक उपजायते ।
विवेकपादपस्यैव भोगमोक्षौ फले स्मृतौ ॥ ५८ ॥
मोक्षद्वारे द्वारपालाश्चत्वारः परिकीर्तिताः ।
शमो विचारः संतोषश्चतुर्थः साधुसंगमः ॥ ५९ ॥
एते सेव्याः प्रयत्नेन चत्वारौ द्वौ त्रयोऽथवा ।
द्वारमुद्धाटयन्त्येते मोक्षराजगृहे तथा ॥ ६० ॥
एकं वा सर्वयत्नेन प्राणांस्त्यक्त्वा समाश्रयेत् ।
एकस्मिन्वशगे यान्ति चत्वारोऽपि वशं यतः ॥ ६१ ॥
सविवेको हि शास्त्रस्य ज्ञानस्य तपसः श्रुतेः ।
भाजनं भूषणाकारो भास्करस्तेजसामिव ॥ ६२ ॥
घनतषपयातं हि प्रज्ञामान्द्यमचेतसाम् ।
याति स्थावरतामम्बु जाड्यात्पाषाणतामिव ॥ ६३ ॥
हिन्दी अर्थ
हे श्रीरामचन्द्रजी, संसाररूपी वन का बन्दर मन बड़ा ही चपल है, उसको संस्कार द्वारा
अपने वश में कर परमार्थतत्त्व का श्रवण करना चाहिए और फिर उसको प्रयत्न से हृदय में
धारण करना चाहिए । विवेकशून्य, शास्त्र के अभ्यास से उत्पन्न ज्ञान से रहित एवं असाधु
पुरुषों में प्रीति रखनेवाले पुरुष से अति दूर होकर चिरकालतक महात्माओं की सेवा करनी
चाहिए। सदा सन्त-महात्माओं की संगति से विवेक उत्पन्न होता है। भोग और मोक्ष विवेकरूपी
वृक्ष के ही फल कहे गये हैं । मोक्षद्वार के चार द्वारपाल कहे गये हैं -शम, विचार, सन्तोष और
चौथा साधुसंगम । पहले तो इन चारों का ही प्रयत्नपूर्वक सेवन करना चाहिए । यदि चारों को
सेवन की शक्ति न हो, तो तीनका सेवन करना चाहिए | तीनका सेवन न हो सकने पर दोका
सेवन करना चाहिए । इनका भलीभाँति सेवन होने पर ये मोक्षरूपीराजगृह में मुमुक्ष॒का प्रवेश
होने के लिए द्वार खोलते हैं । यदि दो के सेवनकी भी शक्ति न हो, तो सम्पूर्ण प्रयत्न से प्राणों
की बाजी लगाकर भी इनमें से एक का अवश्य आश्रय लेना चाहिए । यदि एक वश में हो जाता
है, तो शेष तीन भी वश में हो जाते हैं । जैसे अन्य तेजस्वियों में सूर्य सर्वश्रेष्ठ है वैसे ही
विवेकवान् पुरुष सब लोगों में सिर के आभूषण के समान आदरणीय है । वह शास्त्र के श्रवण,
मनन और निदिध्यासन का और ज्ञान का योग्य पात्र है । जैसे अधिक शीत पड़ने से जल
घनीभूत होकर बर्फ बन जाता है, वैसे ही अविवेकियों की मूर्खता घनता को प्राप्त होकर अति
कठिन हो जाती है