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Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 12, Verses 1–3

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण, सर्ग 12, verses 1–3 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 12 · श्लोक 1-3

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । परिपूर्णमना मान्यः प्रष्टुं जानासि राघव । वेत्सि चोक्तं च तेनाहं प्रवृत्तो वक्तुमादरात् ॥ १ ॥ रजस्तमोभ्यां रहिता शुद्धसत्त्वानुपातिनीम् । मतिमात्मनि संस्थाप्य ज्ञानं श्रोतुं स्थिरौ भव ॥ २ ॥ विद्यते त्वयि सर्वैव प्रच्छकस्य गुणावली । वक्तुर्गुणाश्चैव मयि रत्नश्रीर्जलधौ यथा ॥ ३ ॥

हिन्दी अर्थ

अन्य लोगों के प्रति भी विवेक वैराग्य की अभिवृद्धि के लिए संसारप्राप्ति की अनर्थङरूपता और ज्ञान के माहात्म्य को कहने के इच्छुक श्रीवक्तिष्ठजी श्रीरामचन्द्रजी को प्रवृत्त करने के लिए आप में केवल विकासयुक्त बुद्धि ही नहीं है, किन्तु ओर भी अनेक गुण हैं तथा प्रश्नकर्ता के सम्पूर्ण लक्षण आप में घटते हैं, इस प्रकार प्रशंसा द्वारा प्रोत्साहित करते हुए बोले : हे रघुकुलकमलदिवाकर, आपका मन पूर्वोक्त गुणों से परिपूर्ण है और आप हमारे सामान्य हैं तथा आप प्रश्न करना जानते है, साधारणरूप से उक्त बात को भी विशेषरूप से आप जानते हैं, इसलिए मैं आदरपूर्वक आपको उपदेश देने के लिए उद्यत हुआ हू । रजोगुण ओर तमोगुण से रहित (रजोगुण से बुद्धि में चंचलता आती है और तमोगुण से आवरण होता हे, इसलिए उक्त दोनों गुणों से शून्य होना आवश्यक है), इसीलिए शुद्ध सत््वगुणवाले परमात्मा की ओर प्रवृत्त होनेवाली बुद्धि को आत्मा में स्थापित कर अर्थात्‌ स्वस्थ कर सुनने के लिए प्रवृत्त होए । हे श्रीरामचन्द्रजी, जैसे समुद्र में रत्नसम्पत्ति (रत्नों से परिपूर्ण लक्ष्मी) रहती है वैसे ही प्रश्नकर्ता के सभी गुण आपमें विद्यमान हैं और वक्ता के (उपदेशक के) गुण मुझमें विद्यमान हैं

सर्ग सन्दर्भ

ग्यारहवाँ सर्ग समाप्त बारहवाँ सर्ग संसारप्राप्ति की अनर्थरूपता, ज्ञान का उत्तम माहात्म्य ओर राम में प्रश्नकर्ता के गुणोँ की अधिकता का वर्णन |