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Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 12, Verses 21–22

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण, सर्ग 12, verses 21–22 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 12 · श्लोक 21,22

संस्कृत श्लोक

अन्यच्च राघव । प्रसन्ने चित्तत्त्वे हृदि शमभवे वल्गति परे शमाभोगीभूतास्वखिलकलनादृष्टिषु पुरः । समं याति स्वान्तःकरणघटनास्वादितरसं धिया दृष्टे तत्त्वे रमणमटनं जागतमिदम् ॥ २१ ॥ अन्यच्च । रथः स्थाणुर्देहस्तुरगरचना चेन्द्रियगतिः परिस्पन्दो वातो वहनकलितानन्दविषयः । परोऽणुर्वा देही जगति विहरामीत्यनघया धिया दृष्टे तत्त्वेरमणमटनं जागतमिदम् ॥ २२ ॥

हिन्दी अर्थ

हे रामचन्द्रजी, ओर भी सुनिए, चैतन्यमात्रस्वभाव परमार्थ वस्तु के प्रसन्न होने ओर हृदय में उत्कृष्ट शान्ति का आविर्भाव होने पर सम्पूर्ण बुद्धिवृत्तियों के शान्तिरसास्वादरूप होने पर अन्तःकरण ब्रह्मरसास्वादपूर्वक विषमतारहित स्वभाव को प्राप्त होता है । तब बुद्धि से तत्त्व का साक्षात्कार होने पर यह जगत्‌ का भ्रमण आनन्दमय हो जाता है, अतः जो आनन्दसाधनता कही, वह ठीक ही हे। कटे हुए वृक्ष के समान जड़ शरीर रथ है, इन्द्रियों की विषयाभिमुख प्रवृत्ति घोड़ों की गतिचातुरी है, जिससे घोड़ों का इधर उधर परिचालन किया जाता है अर्थात्‌ लगाम प्राणप्रधान मन है ऐसे रथ आदि के प्रापण से जिसे आनन्दरूप विषयप्राप्त होते हैं वह देही (आत्मा) समाधि में परमात्मा ही है । व्यवहारकाल में बुद्धि आदिके परिच्छेद से भले ही रथी सूक्ष्म हो । तत्त्व का साक्षात्कार होने पर इस प्रकार का शुद्ध, बुद्ध, आनन्दघन मैं विहार कर रहा हूँ, यों विशुद्ध दृष्टि से जगत्‌ का भ्रमण रमण ही है-क्लेशकर नहीं है