Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 13, Verses 1–3
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण, सर्ग 13, verses 1–3 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 13 · श्लोक 1-3
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
एतां दृष्टिमवष्टभ्य दृष्टात्मानः सुबुद्धयः ।
विचरन्तीह संसारे महान्तोऽभ्युदिता इव ॥ १ ॥
न शोचन्ति न वाञ्छन्ति न याचन्ते शुभाशुभम् ।
सर्वमेव च कुर्वन्ति न कुर्वन्तीह किंचन ॥ २ ॥
स्वच्छमेवावतिष्ठन्ते स्वच्छं कुर्वन्ति यान्ति हि ।
हेयोपादेयतापक्षरहिताः स्वात्मनि स्थिताः ॥ ३ ॥
हिन्दी अर्थ
वैराग्य, शान्ति आदि साधनों का आगे वर्णन करनेवाले श्रीवसिष्ठजी इस समय प्रस्तुत
जीवन्युक्तिस्थिति का वर्णन करते हैं ।
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामजी, इस दृष्टि का अवलम्बन कर सुबुद्धिमान् तत्त्वज्ञ
महापुरुष इस संसार में ऐसे विचरते हैं, मानों उन्हें महान् साम्राज्य प्राप्त हो गया हो । वे लोग
नतो अशुभ के लिए शोक करते हैं और न शुभ की कामना करते है अतएव वे उनके साधनों की
भी याचना नहीं करते । वे सब कुछ करते भी हैं फिर भी कुछ नहीं करते । हेय ओर उपादेय के
पक्षपात से रहित एवं अपनी आत्मा में स्थित वे असंग आत्मा के साक्षात्कार से निर्लेप रहते हैं,
शास्त्रीय स्वच्छ कर्म करते हैं ओर सन्मार्ग में जाते हैं
सर्ग सन्दर्भ
बारहवाँ सर्ग समाप्त तेरहवाँ सर्ग जीवनमुक्तिरूप फल के हेतु वैराग्य आदि गुणों का एवं शम का विशेषरूप से वर्णन ।