Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 18, Verse 58
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण, सर्ग 18, verse 58 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 18 · श्लोक 58
संस्कृत श्लोक
अवस्तु पूर्वापरयोर्वर्तमाने विचारितम् ।
यथा जाग्रत्तथा स्वप्नः सिद्धमाबालमागतम् ॥ ५८ ॥
हिन्दी अर्थ
हेतु आदि भूत जगत् की स्वप्नोपमता का साधर्म्यप्रदर्शन द्वारा उपपादन करते हैं।
उत्पत्ति के पूर्वकाल में और विनाश के उत्तरकाल में अवस्तुभूत (अभावग्रस्त) यह
जगत् वर्तमानकाल में भी विचार करने पर अवस्तुभूत ही है, अतः जैसे जाग्रत् पदार्थ हैं वैसे
ही स्वप्न पदार्थ भी हैं, दोनों में मिथ्यात्व का साम्य हे, यह बात बालकों तक की समझ में
आ सकती हे