Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 18, Verses 59–60
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण, सर्ग 18, verses 59–60 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 18 · श्लोक 59-60
संस्कृत श्लोक
स्वप्नसंकल्पनाध्यानवरशापौषधादिभिः ।
यथार्था इह दृष्टान्तास्तद्रूपत्वाज्जगत्स्थितेः ॥ ५९ ॥
मोक्षोपायकृता ग्रन्थकारेणान्येऽपि ये कृताः ।
ग्रन्थास्तेष्वियमेवैका व्यवस्था बोध्यबोधने ॥ ६० ॥
हिन्दी अर्थ
यदि शंका हो कि प्रतिभासिक सत्तावाले स्वप्न से व्यावहारिक सत्तावाले की तुलना कैसे
हो सकती है 2 इस पर उन दोनों में परस्पर कार्यकारणता के प्रदर्शन से और लौकिक व्यवहार
से तुलना है, ऐसा कहते हैँ ।
जाग्रत्काल में विजययात्रा करनी चाहिए अथवा नहीं, यों यात्रा के विषय में सन्देह होने
पर देवताप्रार्थनापूर्वक सोये हुए पुरूष का स्वप्न में यात्रा करनी चाहिए ऐसा संकल्प होने पर
चिरकाल तक पूजा, मन्त्रजप, स्तुति आदि से विजययात्रा के अनुकूल वर मिलने या शत्रुओं
के प्रति मुनिशाप आदि देखने पर प्रातःकाल यात्रा करने से शत्रुओं पर विजय देखी जाती
है और स्वप्न में ओषधिकी प्राप्ति से जाग्रतावस्था में रोगशान्ति देखी जाती है । यों
स्वप्नसादुश्य होने के कारण सम्पूर्ण जगत् की व्यवस्था स्वप्नरूप ही हे, अतएव जाग्रत् में
स्वप्नदुष्टान्त यथार्थ ही हैं । मोक्ष के उपायों की रचना करनेवाले महामुनि वाल्मीकि जी ने
अन्य भी पूर्व रामायण आदि जिन ग्रन्थों की रचना की है, उनमें भी दृष्टान्तो की बोध्य के
साम्य के बोधन में यही केवल एक व्यवस्था प्रसिद्ध है अर्थात् जिस अंश में साम्य संभव हो
उसी अंश के साम्यज्ञापन में व्यवस्था प्रसिद्ध हे