Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 18, Verse 70
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण, सर्ग 18, verse 70 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 18 · श्लोक 70
संस्कृत श्लोक
अस्माकमस्ति मतिरङ्ग तयेति सर्वशास्त्रैकवाक्यकरणं फलितं यतो यः ।
प्रातीतिकार्थमपशास्त्रनिजाङ्गपुष्टात्संवेदनादितरदस्ति ततः प्रमाणम् ॥ ७० ॥
हिन्दी अर्थ
यदि ऐसी बात है, तो कपिल, कणाद, जैमिनि आदिने वेदार्थ के ज्ञाता होने पर भी,
पुरुषार्थ ओर उसके उपायभूत तत्त्व का निरूपण अन्यथा ही कैसे किया और आप अन्यथा
ही उसका निरूपण कैसे कर रहे हैं, आपके कथन में कौन-सी विलक्षणता है ? ऐसी शंका
होने पर कहते हैं ।
हे श्रीरामचन्द्रजी, जिस बुद्धिसे तत्त्वसाक्षात्कारजनित जीवन्मुक्तिरूप शुभ भाग्य होता
है, वैसी हमारी बुद्धि है, उस बुद्धि से पूर्वोक्त रीति से अपरोक्षानुभवयोग्य परमपुरुषार्थ जिससे
प्राप्त होता है, वैसी सम्पूर्ण श्रुतियों की-आध्यात्मिक शास्त्रोंकी-एक वाक्यता (एक महावाक्य
के अर्थ में पर्यवसान) फलित होती है । उससे भिन्न श्रुति के तात्पर्य का अविषय, केवल तर्क
आदि से ही पुष्ट (विकसित) सांख्य, कणाद आदि का ज्ञान है । हमारा प्रमाण उससे सर्वथा
विलक्षण महावाक्यार्थरूप अपरोक्षानुभव योग्य अर्थवाला है, उनका वैसा नहीं हे । भाव यह
कि उनकी मति कुतर्को से कुण्ठित हो गई है, अतएव वे श्रुति के तात्पर्य का निश्चय करने योग्य
बुद्धि से विरहित हे