Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 19, Verse 2
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण, सर्ग 19, verse 2 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 19 · श्लोक 2
संस्कृत श्लोक
दृष्टान्तबुद्धावेकात्मज्ञानशास्त्रार्थवेदनात् ।
महावाक्यार्थसंसिद्धा शान्तिनिर्वाणमुच्यते ॥ २ ॥
हिन्दी अर्थ
दृष्टान्त बुद्धि का फल कहते हैं ।
तत् ओर त्वं पदार्थ के परिशोधन के उपयोगी तत्-तत् दृष्टान्तबुद्धि होने पर अद्वितीय
ज्ञानस्वरूप आत्मतत्त्वरूप शास्त्रार्थ का (सम्पूर्ण वेदान्तो के तात्पर्यका विषय होने से आत्मतत्व
शास्त्रार्थ है) ज्ञान होने से अर्थात् अद्वितीय आत्मतत्त्वविषयक अखण्डाकार वृत्ति का उदय
होनेसे उससे अभिव्यक्त महावाक्यार्थभूत ब्रह्मस्वरूप से ही भली भाँति सिद्ध अज्ञान ओर
उसके कार्य का विनाशरूप निर्वाण होता हे । वही निर्वाण दुष्टान्तवुद्धि का फल कहा जाता हे ।
इसलिए दृष्टान्त और दार्ष्टान्तिकों के विविध विकल्पों का अर्थात् दृष्टान्तका दार्ष्टान्तिक से
भेद ओर दृष्टान्त में दार्ष्टान्तिक के प्रचुरधर्मवत्त्वके प्रसंजक- क्या यह दृष्टान्त सर्वाश में है,
या कुछ धर्मो के अंशमें इत्यादि-विकल्पों का कोई प्रयोजन नहीं हे