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Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 2, Verse 11

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण, सर्ग 2, verse 11 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 2 · श्लोक 11

संस्कृत श्लोक

रामो यदन्तर्जानाति तद्वस्त्वित्येव सन्मुखात् । आकर्ण्य चित्तविश्रान्तिमाप्नोत्येव मुनीश्वराः ॥ ११ ॥

हिन्दी अर्थ

यदि श्रीरामचन्द्रजी तत्त्वज्ञानी हैं, तो उन्हें उपदेश देने के लिए श्रीवसिष्ठजी की वक्ष्यमाण (कही जानेवाली) प्रार्थना क्यों करते हैं, इस पर कहते हैं। हे मुनिनायकों, श्रीरामचन्द्रजी जिस तत्त्व को जानते हैं, उसे श्रीगुरुमुख से यही वस्तु है, ऐसा सुनकर श्रीरामजी का चित्त अवश्य विश्रान्ति को प्राप्त होगा ही, अन्यान्य अधिकारी पुरुष भी उपदेश सुनकर विश्रान्ति को प्राप्त होंगे। इस प्रकार सबके उपकार के लिए हम वसिष्ठजी की प्रार्थना करते हैं, यह भाव है अथवा श्रीरामचन्द्रजी ने जिस तत्त्व को स्वयं विचार से जाना है, उसमें उन्हें यही वस्तु है, ऐसा दृढ़ विश्वास न होने के कारण वह अप्राप्त सा ही है, गुरुमुख से उसे सुनकर श्रीरामचन्द्रजी उसमें विश्वास होने के कारण अवश्य चित्तविश्रान्ति ((--)) को प्राप्त होंगे