Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 2, Verse 10
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण, सर्ग 2, verse 10 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 2 · श्लोक 10
संस्कृत श्लोक
अतएव हि विज्ञातज्ञेयं विद्धि रघूद्वहम् ।
यदेनं रञ्जयन्त्येता न रम्या भोगभूमयः ॥ १० ॥
हिन्दी अर्थ
इस प्रकार व्यतिरेकप्रकर्ष से अन्वयप्रकर्ष लक्षित होता है, अर्थात् ज्ञातव्य तत्त्व का ज्ञान होने पर
ही विषयों में वैराग्य होता है, क्योकि रसोउ्प्यस्य परं ष्ट्रा निवतति एसा भगवान् का वचन है ।
मुनिवृन्द, इसलिए आप लोग श्रीरामचन्द्रजी को निश्चय ज्ञातज्ञेय (जिसने ज्ञातव्य तत्त्व को जान
लिया है) जानिये, क्योकि इन्हें ये मनोहर विषय अनुरंजित (प्रसन्न) नहीं कर रहे हैं