Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 2, Verses 21–23
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण, सर्ग 2, verses 21–23 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 2 · श्लोक 21,22
संस्कृत श्लोक
अशिष्यायाविरक्ताय यत्किंचिदुपदिश्यते ।
तत्प्रयात्यपवित्रत्वं गोक्षीरं श्वदृताविव ॥ २१ ॥
वीतरागभयक्रोधा निर्माना गलितैनसः ।
वदन्ति त्वादृशा यत्र तत्र विश्राम्यतीह धीः ॥ २२ ॥
इत्युक्ते गाधिपुत्रेण व्यासनारदपूर्वकाः ।
मुनयस्ते तमेवार्थं साधुसाध्वित्यपूजयन् ॥ २३ ॥
हिन्दी अर्थ
पात्र में यदि उसका दान न किया जाय, तो व्यर्थ होने के कारण वह निन्दनीय ही होगा, यह भाव है ।
वैराग्यशून्य असत् शिष्य के लिए जो कुछ भी उपदेश दिया जाय, वह कुत्ते के चमड़े से बने पात्र में
रक्खे हुए गाय के दूध की नाई अपवित्रता को प्राप्त हो जाता है। हे प्रभो, वीतराग, भय तथा क्रोध से
रहित, अभिमानशून्य और पापविवर्जित आप जैसे महापुरुष जिसे उपदेश देते हैं, उसकी बुद्धि नित्य
अपरोक्ष परमात्मतत्त्व में विश्रान्त हो ही जाती है