Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 2, Verse 28
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण, सर्ग 2, verse 28 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 2 · श्लोक 28
संस्कृत श्लोक
वाल्मीकिरुवाच ।
इति निगदितवानसौ महात्मा परिकरबन्धगृहीतवक्तृतेजाः ।
अकथयदिदमज्ञतोपशान्त्यै परमपदैकविबोधनं वसिष्ठः ॥ २८ ॥
हिन्दी अर्थ
वाल्मीकिजी ने कहा : महात्मा श्रीवसिष्ठजी यों स्पष्टतया प्रतिज्ञा कर जैसे पहलवान् या नट भूषण,
वस्त्र, अस्त्र-शस्त्र आदि सामग्री को लेकर उद्यत होता हुआ शोभित होता हे वैसे ही प्रबोधप्राप्ति द्वारा
शिष्य के अनुरंजन में उपायभूत दृष्टान्त, उपाख्यान, प्रमाण ओर तर्क आदि का अनुसन्धान, उत्साह
आदि परिकरबन्धन से व्याख्याता ओं के तेज को स्वीकार कर जगत् की अज्ञानता का विनाश करने
के लिए मुख्यरूप से परमात्मा के बोधक शास्त्र को कहने लगे