Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 3, Verse 1
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण, सर्ग 3, verse 1 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 3 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
पूर्वमुक्तं भगवता यज्ज्ञानं पद्मजन्मना ।
सर्गादौ लोकशान्त्यर्थं तदिदं कथयाम्यहम् ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
इस प्रकार पूर्व वृत्तान्त का सम्पूर्णतया स्मरणकर विस्तारपूर्वक उसको कहने के लिए
प्रस्तुत श्रीवसिष्ठजी सद्गुरुस्मरणरूप मंगल करते हुए एवं विद्या के सम्प्रदाय की शुद्धि को
दशति हुए शिष्य श्रीरामचन्द्रजी के ध्यान को अपनी ओर आकृष्ट करने के लिए पुनः प्रतिज्ञा
करते हैं।
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : मुनिश्रेष्ठ विश्वामित्रजी, पहले सृष्टि के आरम्भ में भगवान् श्री
ब्रह्माजी ने सांसारिक सकल दुःखों की निवृत्ति के लिए जिस ज्ञान का उपदेश दिया था,
उसीको मैं कहता हूँ, उससे अन्य नहीं
सर्ग सन्दर्भ
दूसरा सर्ग समाप्त तीसरा सर्ग श्रीरामचन्द्रजी की शंका के निराकरण के बहाने स्थूल आदि जगत् के अध्यारोप ओर अपवाद से प्रत्यगात्मरूप विषय की सिद्धि |