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Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 2, Verses 4–8

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण, सर्ग 2, verses 4–8 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 2 · श्लोक 4-8

संस्कृत श्लोक

भोगभावनया याति बन्धो दार्ढ्यमवस्तुजः । तयोपशान्तया याति बन्धो जगति तानवम् ॥ ४ ॥ वासनातानवं राम मोक्ष इत्युच्यते बुधैः । पदार्थवासनादार्ढ्यं बन्ध इत्यभिधीयते ॥ ५ ॥ स्वात्मतत्त्वाभिगमनं भवति प्रायशो नृणाम् । मुने विषयवैरस्यं कदर्थादुपजायते ॥ ६ ॥ सम्यक्पश्यति यस्तज्ज्ञो ज्ञातज्ञेयः स पण्डितः । न स्वदन्ते बलादेव तस्मै भोगा महात्मने ॥ ७ ॥ यशःप्रभृतिना यस्मै हेतुनैव विना पुनः । भुवि भोगा न रोचन्ते स जीवन्मुक्त उच्यते ॥ ८ ॥

हिन्दी अर्थ

हे राम, विद्वान लोग वासनाक्षय को "मोक्ष" कहते हैं और विषयों में वासना की दृढता को बन्ध कहते हैं अर्थात्‌ जितनी ही विषयवासना क्षीण होती जायेगी, उतना ही संसार से (बन्धसे) छुटकारा मिलता जायेगा । वासना के सर्वथा क्षीण होने पर सर्वतः मुक्ति हो जाती है । मुनिवरो, मनुष्य को आत्मतत्त्व का आपात ज्ञान (सामान्य ज्ञान) प्रायः अल्प श्रवण आदि प्रयास से भी हो जाता है, (अर्थात्‌ अपरोक्ष दुक्‌स्वरूप आत्मा का केवल दृश्य विवेक से भी अच्छा परिचय प्राप्त हो जाता है) पर विषयों मेँ विराग तो क्लेश से ही होता हे । जो व्यक्ति भलीर्भोति (राग आदि से अप्रतिहत होकर) आत्मदर्शी होता है वही यथार्थ आत्मज्ञानी (तत्त्वज्ञान से उत्पन्न अविद्याध्वंसरूपी फलवाला) है, वही यथार्थ ज्ञातज्ञेय (ज्ञातव्य तत्त्वका ज्ञाता) है और वही पण्डित है । सामान्यरूप से आत्मदर्शी पुरुष वैसा नहीं हे, कारण कि उससे मूढता बिलकुल नष्ट नहीं हो जाती । उक्त महात्मा पुरुष को भोग हठात्‌ अच्छे नहीं लगते। जिसे यश, पूजा, लाभ आदि उद्देश्यों के बिना ही भोग अच्छे नहीं लगते वह सांसारिक जीवन्मुक्त कहलाता है, भाव यह कि दम्भ से जो भोग का त्याग किया जाता है, उससे इष्टसिदधि नहीं होती